कल्पना कीजिए, आपके शहर में हर दिन टनों कचरा निकलता है, प्लास्टिक, खाना, घरेलू कचरा और न जाने क्या-क्या। अगर यही कचरा बिजली में बदल जाए तो? सुनने में असंभव लगता है, लेकिन यही कर दिखा रही है JITF Infralogistics Ltd, जिसने हाल ही में दो बड़े वेस्ट-टू-एनर्जी (Waste-to-Energy) प्रोजेक्ट्स के समझौते किए हैं। इस खबर के बाद कंपनी के शेयर 5 प्रतिशत के अपर सर्किट तक पहुंच गए।

2025 में यह खबर क्यों अहम है?
साल 2025 में भारत तेजी से स्वच्छ ऊर्जा और सतत विकास (Sustainable Growth) की दिशा में बढ़ रहा है। सरकार “स्वच्छ भारत” और “हरित ऊर्जा” को बढ़ावा देने में लगी है। ऐसे समय में वेस्ट-टू-एनर्जी सेक्टर देश के लिए दोहरी राहत लेकर आता है –
- बढ़ते कचरे की समस्या से निपटना
- किफायती और स्वच्छ ऊर्जा पैदा करना
इसी कारण JITF Infralogistics द्वारा ₹750 करोड़ के दो समझौतों पर हस्ताक्षर करना सिर्फ़ एक कारोबारी खबर नहीं, बल्कि भारत की पर्यावरण नीति में एक महत्वपूर्ण कदम है।
क्या है यह कंसेशन एग्रीमेंट है?
कंसेशन एग्रीमेंट (Concession Agreement) एक सरकारी अनुबंध होता है जिसमें किसी निजी कंपनी को किसी परियोजना को एक निश्चित समय तक विकसित और संचालित करने की अनुमति दी जाती है।
JITF की सहायक कंपनी ने दो ऐसे समझौते किए हैं –
- नेल्लोर (आंध्र प्रदेश) में 12 मेगावाट का वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट – ₹320 करोड़ की परियोजना
- काकीनाडा–राजमुंद्री क्लस्टर में 15 मेगावाट का प्लांट – ₹430 करोड़ की परियोजना
इन संयंत्रों में नगर निगम के कचरे को उच्च तापमान पर जलाकर बिजली उत्पन्न की जाएगी। इससे बिजली भी बनेगी और लैंडफिल का दबाव भी घटेगा।
फायदे और नुकसान
| पहलू | फायदा | नुकसान |
|---|---|---|
| पर्यावरण | कचरा घटता है, प्रदूषण कम होता है | प्रदूषण नियंत्रण की लागत अधिक |
| अर्थव्यवस्था | निवेश और रोजगार के अवसर | रखरखाव महंगा |
| शहरी जीवन | लैंडफिल कम होते हैं | निरंतर कचरे की आपूर्ति जरूरी |
| ऊर्जा | हरित बिजली का उत्पादन | परियोजना में समय अधिक लगता है |
भारतीय संदर्भ और आँकड़े
JITF की सहायक कंपनी Jindal Urban Infrastructure Ltd (JUIL) देश की सबसे बड़ी वेस्ट-टू-एनर्जी डेवलपर है। इसके पास 8 प्रोजेक्ट हैं जिनकी कुल क्षमता 153 मेगावाट है – दिल्ली (ओखला, टेकहैंड), गुन्टूर, विशाखापत्तनम, अहमदाबाद और जयपुर जैसे शहरों में।
वित्त वर्ष 2026 की पहली तिमाही में कंपनी का राजस्व 18% बढ़कर ₹550.16 करोड़ हो गया, जबकि मुनाफा ₹23.12 करोड़ से घटकर ₹4.71 करोड़ के घाटे में चला गया। यह दिखाता है कि बिक्री बढ़ने के बावजूद परिचालन लागत एक चुनौती बनी हुई है।
कचरे से कमाल
दिल्ली का ओखला वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट एक उदाहरण है। पहले यहां कचरे के पहाड़ और दुर्गंध थी, लेकिन अब वही कचरा रोजाना हजारों घरों को बिजली दे रहा है। अब यही मॉडल आंध्र प्रदेश में लागू होने जा रहा है।
निष्कर्ष
कचरा अब सिर्फ़ “वेस्ट” नहीं, बल्कि “वैल्यू” बन चुका है। JITF Infralogistics जैसी कंपनियां भारत को हरित और आत्मनिर्भर ऊर्जा की दिशा में आगे बढ़ा रही हैं। आने वाले वर्षों में यह तकनीक शहरों को स्वच्छ और ऊर्जा-सक्षम बनाएगी।






