ऑटो सेक्टर की दिग्गज कंपनी Hindustan Motors Limited के शेयर में आज तेज़ गिरावट देखी गई। कंपनी के डीलिस्टिंग और ट्रेडिंग सस्पेंशन के ऐलान के बाद स्टॉक 5% के लोअर सर्किट में फँस गया।

क्या है खबर?
Hindustan Motors ने SEBI (Delisting of Equity Shares) Regulations, 2021 की धारा 5 और 6 के तहत स्वैच्छिक डीलिस्टिंग के लिए आवेदन किया है।
- NSE पर ट्रेडिंग सस्पेंशन: 3 अक्टूबर 2025 से
- स्थायी डीलिस्टिंग: 10 अक्टूबर 2025 से
कंपनी का कहना है कि NSE से इसकी सिक्योरिटीज़ का प्रवेश (admission) पूरी तरह वापस ले लिया जाएगा।
शेयर बाज़ार की स्थिति
- मार्केट कैप: Rs 475.95 करोड़
- पिछले क्लोज़: Rs 24.01
- ओपनिंग प्राइस: Rs 23.90
- इंट्राडे लो: Rs 22.81
- लोअर सर्किट: -5% पर लॉक
डीलिस्टिंग की संभावित वजहें
- कमज़ोर ट्रेडिंग वॉल्यूम्स: लंबे समय से शेयर में बहुत कम कारोबार हो रहा था।
- ऑटो मैन्युफैक्चरिंग से एग्ज़िट: कंपनी ने कई साल पहले गाड़ियाँ बनाना बंद कर दिया था।
- लिस्टिंग कॉस्ट: लिस्टेड रहने पर लगातार compliances, regulatory filings और disclosure की ज़रूरत होती है, जो inactive या dormant कंपनी के लिए बोझ बन जाता है।
- प्राइवेट स्ट्रक्चर की सुविधा: प्रमोटर्स restructuring और repurposing के लिए unlisted status को ज़्यादा सुविधाजनक मान सकते हैं।
वित्तीय स्थिति
- पिछले दो क्वार्टर्स में nil sales
- Other income:
- मार्च 2025: Rs 1.06 करोड़
- जून 2025: Rs 5.11 करोड़ (Uttarpara municipal tax settlement के चलते write-back हुआ)
- Accumulated losses:
- मार्च 2017: Rs 252.18 करोड़
- मार्च 2025: Rs 107.52 करोड़
- Debt-free status (सिर्फ़ मामूली liabilities बची हैं)
- Current assets > current liabilities → liquidity मज़बूत
कंपनी का इतिहास
1942 में बनी Hindustan Motors Limited, CK Birla Group का हिस्सा है और भारत की सबसे पुरानी ऑटोमोबाइल कंपनियों में से एक रही है।
- इसकी Ambassador कार भारतीय सड़कों की पहचान बन गई थी।
- Mitsubishi जैसे वैश्विक ब्रांड्स के साथ partnerships भी कीं।
- लेकिन बढ़ती competition और demand गिरने के कारण 2014 में Ambassador का production बंद कर दिया गया।
- आज कंपनी के पास बहुत सीमित ऑटो ऑपरेशंस हैं और यह ज़्यादातर existing assets के मैनेजमेंट और restructuring पर ध्यान दे रही है।
निष्कर्ष
Hindustan Motors का NSE से डीलिस्ट होना एक ऐतिहासिक कंपनी के पब्लिक मार्केट से पूरी तरह बाहर निकलने का संकेत है। कमज़ोर ऑपरेशंस, घटते volumes और compliance burden के चलते यह कदम उठाया गया है। हालांकि कंपनी debt-free है और restructuring की कोशिशों में लगी हुई है, मगर अब इसका सफर निजी (private) ढाँचे में ही आगे बढ़ेगा।







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